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ख्वाहिशें

कैसा होता जो
वीरान कर अपने तमाम शहर
हम वापस लौट जाते फिर जंगल को
नजर भर हरियाली होती
सांस भर हवा
भूख भर रोटी
और आत्मा भर संगीत

कैसा होता जो
छोटे बच्चे तय करते
हमारी दुनिया का भविष्य
बूढ़े भागते भर दिन
तितलियों और फूलों के पीछे

कैसा होता जो
हत्या, अपहरण, बलात्कार
बम विस्फोट
और युद्ध की ख़बरों की जगह
अखबारों के पन्नों पर
हर रोज छपते
प्रेमियों के खूबसूरत प्रेमपत्र

कैसा होता
जो मैं साठ का न होकर
फिर से इक्कीस का होता
और तुम सत्रह की
चाय के बहाने मैं छू लेता
तुम्हारी ऊंगलियां
तिनके के बहाने तुम
सुलझा देती मेरे उलझे बाल

कैसा होता जो
कुछ और मुलायम होती धरती
धुएं का न होता आसमान
सचमुच होता कोई ईश्वर
और संकट में हमारी प्रार्थनायें
सुन ली जातीं !

– ध्रुव गुप्त