ख्वाहिशें

कैसा होता जो वीरान कर अपने तमाम शहर हम वापस लौट जाते फिर जंगल को नजर भर हरियाली होती सांस भर हवा भूख भर रोटी और आत्मा भर संगीत कैसा…

Continue Readingख्वाहिशें

ख़्वाब

कौनसा रंग लाएगा ख़्वाब, क्या क्या गुल खिलायेगा ख़्वाब। क्या ख़्वाब का ख़याल रखूं? ख़याल से मिलाएगा ख़्वाब? नींद की तहों में छिपकर, आंख को रुलाएगा ख़्वाब। सांस रुकने लगी…

Continue Readingख़्वाब

एकांत

एकांत बुरा नही है, एकांत तो साथी है। बड़े से बग़ीचे में बैठें भवरों को निहारने का सुख है एकांत। तालाबों में कंकड़ मारते हुए डूबकर उस पार को जाना…

Continue Readingएकांत

End of content

No more pages to load