You are currently viewing कश्मीर

कश्मीर

ये जो मार रहे हो पत्थर तुम
यूँ कब तक आकाश जलाओगे ?
स्वर्ग में भी रहकर इक दिन
तुम मिट्टी में मिल जाओगे

चाहते हो तुम क्या ?
अब ये धरती उगले लावा
क्या नहीं पता है नाता सबसे
क्यों करते हो फिर ये छलावा
खून से खून मिलाकर देखो,
अपना ही सग़ा तुम पाओगे
ये जो मार रहे हो पत्थर तुम
यूँ कब तक आकाश जलाओगे ?

माँ का प्यार कभी भी
लड़कर नहीं पाया जाता
आँचल पर उसके लाल रंग
यूँ हर बात में नहीं लगाया जाता
फिर चूम के इस धरती को तुम
अब कौन सा जाल बिछाओगे
ये जो मार रहे हो पत्थर तुम
कब तक आकाश जलाओगे ?

– अविनीश मिश्रा