आँखों में वो जूनून दिखा
जो समंदर डुबो दे
उम्मीदों में वो अलख जगा
जो घने अँधेरे को चीर दे
खुदी को पहचान तू ग़ालिब
की बस नहीं है खुदी का सवाल
औरो का भी वजूद है तुझी से
ये वक़्त को साबित कर जता दे
ऐ वक़्त के मुसाफिर…

कभी जो टूटे तू,
तो मिट्टी सा संवर के दिखा दे,
गर कश्ती फंसी हो, लाख तूफानों में,
तू दरिया चीर कर बता दे
राह में बिछे हो कांटे तो क्या?
पाँव में पड़े हो छाले तो क्या?
तू राह पर बिना डिगे,
मंजिल पर चल कर दिखा दे
ए वक्त के मुसाफिर तू खुद को साबित कर के बता दे…

कभी जो दिखे किसी के आँसू
तू उन्हें मोती बना दे
होता नहीं ये सफर आसां
कितने मिलेंगे और छूटेंगे
तू रखना अपनी फितरत कुछ इस तरह,
की किसी के भी दिल में जगह बना ले,

ऐ वक़्त के मुसाफिर…
जब न हो सर पर छत
तो बारिश का मजा लेना,
तकलीफों के सौदागर बनना
ग़मों को बांट देना
जिंदगी का गीत कुछ यूँ लिखना की,
हर कोई उसे अपना साज बना ले,
ऐ वक़्त के मुसाफिर….

-इरीना बाघेल