युगों-युगों से
अंबर-अंबर
पर्वत-पर्वत
जंगल-जंगल
अनहद नाद की तरह बजते हुए
अपने-आप में मग्न हो
बस उसे बहते रहना था
क्योंकि बहना ;
नदी होना है

-आमिर विद्यार्थी