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रोज़ाना

जब से शहर में आया हूँ
बड़ी बड़ी गाड़ियाँ,
मेट्रो रोज़ाना सफ़र करवाती हैं मुझे;
पर फिर भी दौड़ने का,
साइकिल पर पेडल मारने का मन करता है

रोज़ाना के सफ़र के बाद भी
मैं अब कहीं नही जाता
जबकि बचपन में साइकिल के
चार पेडल मारकर
हर जगह पहुँच जाता था |

कुछ मेरा ही दोष है
जो अब चाहकर भी
मैं साइकिल नही चलाना चाहता ,
हाँ, कभी कभी दौड़ने की कोशिश
जरुर कर लेता हूँ |

लेकिन वो दौड़ भी ये शहर पूरी नही
होने देता |

– सुलभ सिंह