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पानी

कैसा यह हुजूम है
आज जुटा गया पानी
मीलों तक सफ़र नंगे पाँव
करा रहा है पानी

कुएँ से निकलता
बालटियों में पानी
होता घागर में समाहित
बनकर अमृत यह पानी

आँखों से नीत टपकता
सिसकियाँ भरता पानी
बो कर बीज वेदना के
गूँगा-अंधा हो गया पानी

न जानें क्यों महंगा इतना
आज हो गया है पानी!
कि प्यासी-प्यासी सी लगती है
क्यों सबकी जिंदगानी?

-कैलाश बनकर “चाँद”