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गुब्बारे

जिंदगी गुब्बारे सी हो चली है
अब तो,
दुनिया की नज़र में
यूँ तो हवा में होते हैं आप,

लेकिन अंदर की हवा
कितनी गर्म है ?
ये कोई नहीं जानता,

और तो और कुछ लोग
सुई और कांटे लिए
आसपास ही मंडरा रहे हैं,

न जाने किस फ़िराक में हैं ?

ताज्जुब की बात है कि
मैं उन सबको क़रीब से जानता हूँ |

– सुलभ सिंह