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क्षुधा

जय की ज्वलन्त
सी क्षुधा है जल रही
मन की मातंग
सी मनेक्षा मचल रही
हृदय ये क्रंदन करे
हाल देख आत्म की
अर्ध प्रकाशित नयन
तन विरक्त कर रहा
आत्म की आसक्ति से
अंतःकरण अशक्त है
नियति का खेल है या
नीयत का ?
सोच सोच बस यही
अपंग सा तन हो रहा
यद्यपि अब भी जीवित
जय की ज्वलन्त
सी क्षुधा है जल रही
अशक्त अंतःकरण में
प्राणवायु भर रही..

– नीतेश कुमार चतुर्वेदी