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आशीर्वचन

जब छाई होती है निराशा
पहले ही जा चुका होता है
अंधेरे का आधा पखवाड़ा
कुछ बीत चुका होता है
पतझड़ का अंधड़
उतरकर बैठ चुका होता है
हृदय की घाटी में
एक शांत कोहराम
अपने ही ओर आ रहा
आकाश से भीमकाय उल्कापिंड
देख मुँद चुकी होती हैं आँखें
अपने लोग ही बदल चुके होते हैं
अंजान चेहरों में
दिशायें भाग रही होती हैं
दूर हाथ छुड़ा कर
और हम खुद से भी
तब भी यह तय होता है कि
यह सब शाश्वत नहीं
उम्मीद बनकर दिमाग में
कौंधा एक चेहरा
अनायास याद आया
एक विचार
खुली खिड़की से घर में
घुस आई बंसती हवा
काँधे पर महसूस हुआ
एक स्नेहिल स्पर्श या
हाथ लगी पिता की
संघर्ष भरी डायरी
सबकुछ कर देती है
व्यवस्थित और
जाती हुई निराशा दे जाती है
‘खुश रहो, बढ़ते रहो’ का आशीर्वचन।

-आलोक कुमार मिश्रा