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कंफ्यूज़ इश्क़

कंफ्यूज़ इश्क़

फोन पर बात करते करते आज तुम्हारी आवाज बैठ गई, मैंने पूछा तो तुमने कह दिया कि गला खराब है। कितना मुश्किल होता है ना उस शख्स से झूठ बोलना जिसकी आंखों से कभी अपने सपने देखे हो। मुझे पता था तुम झूठ बोल रही हो लेकिन तुम्हें बताया नहीं. आवाज नहीं ये वक़्त ही खराब है जिसने कुछ किमी की दूरी को कई महीनों की बना दिया है। लॉकडाउन की दूरियों ने हमें कितना समझदार कर दिया है ना और सुनो मैंने भी कॉफ़ी छोड़कर तुम्हारी अदरक वाली चाय शुरू कर दी है।
हम जल्द मिलेंगे फिर उसी कनॉट प्लेस वाले झंडे के नीचे अदरक वाली चाय के दो मिट्टी वाले प्याले और कंफ्यूज से इश्क़ के साथ…

कीर्ति देव पांडेय

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