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जब से तुम मिली हो

दो – चार
महीनों से बस
यूँ ही
तुझसे मैं जुड़ा हूँ

जैसे सालों से
बस
तुम्हारे ही इंतज़ार में
जी रहा हूँ

जब से तुम
मिली हो
देखो मैं
बदल सा गया हूँ

रोते – हँसते
बस तुझसे ही है अपनी यारी
बस तुम ही लगती हो
मुझे सबसे प्यारी

हँसते जो तुझको देखूँ
आ जाता है मेरे दिल को सुकून
जो तू कभी तेरी आँखें रोती है
मेरी आँखें भी रात भर नही सोती है

तुम और तुम्हारी बिखरती जुल्फें
दोनों है ज़िन्दगी मेरी
जीने का सहारा बस
तुम ही हो … तुम ही हो

हाँ , मैं पागल हूँ
सरफिरा हूँ
लेकिन जो भी हूँ
बस तेरा ही हूँ

दिल में जो बातें थी
हाँ , वही जो अनकही सी थी
सब कहना है तुम्हें
बस अब यही शौक है

जैसे कॄष्ण ने
राधा को चाहा था
वैसे ही मुझे तुम्हें
चाहना है

आसमा पर छाना है
बस एक तेरा ही
नाम गुनगुनाना है
तुझे ही अपना रब बनाना है |

-सत्यम सोलंकी