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खारिज़

कोई पत्ता गिरता हो अटक अटक कर दरख़्त से जैसे
तुम्हारा ना होना ऐसे ख़ारिज करता रहता हूँ मैं।

मैं हर वक़्त ख़ुद को पाता हूँ
तुम्हारे होने और ना होने के बीच में

मैं सोचता हूँ,
क्यों आख़िर ख़त आने बंद हो गए हैं
क्यों नींद से एक चेहरा ग़ायब हो गया है
मैं सोचता हूँ,
क्यों तसव्वुर में नहीं अब किसी मो’तबर के साथ
बारिश, नदी और पहाड़ देखना
क्यों ये चाँद अब आँखो में चुभने लग गया है
मैं सोचता हूँ ,
मेरी नज़्मों से क्यों ग़ायब हो गये हैैं
किसी के रुख़सार, ज़ुल्फ़ें किसी की,
क्यों ग़ायब हो गई है किसी की मुस्कराहट

और जैसे अचानक ही ठहरे हुए पानी में कोई पत्थर मारे
समझा लेता हूँ मैं ख़ुद को वैसे ही
नहीं वो नहीं है अब
वो थी ही नहीं |

– पंकज विश्वजीत