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II अपनी भाषा , अपना मंच II

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सोच सेगमेंट

खाताबही

मार्च बीतने से पहले बहुत से हिसाब किताब क्लियर कर लिए हैं । इस अप्रैल से उम्मीदों की नई खाताबही में रिश्तों की उधारी नही करूंगा । – केतन अग्रवाल

एक उम्र ‘गुस्ताखियों’ के लिए

एक उम्र ‘गुस्ताखियों’, के लिए भी  होनी चाहिए… ये कम्बक्त जिंदगी तो.., बस… ‘अदब और लिहाज’ में ही गुजर गई। – कंचना खपरे

फरवरी

उम्मीद

उठो मेरे हौसले, अब मत ऊँघो… लो वही अंगड़ाई, एक बार फिर से बेफिक्री की…इश्क़ की… जिन्दा रहने की नहीं..जीने की… उठो… उठो और देखो तुम्हे जगाने, किरणों में छुपकर उम्मीद आई है। – जितेन्द्र परमार

जिंदगी के पन्ने

जिंदगी भी किताब से कम नहीं है कुछ पन्नों के बीच कुछ सूखे फूल कुछ पन्नों को फाड़ कर कुछ पन्नों को मोड़ कर कुछ पन्नों पर कुछ लिख कर कुछ पढ़े- कुछ अधूरे पन्ने कुछ मैले कुचले कुछ साफ… Continue Reading →

शहर की छत

अब शाम होती है तो घर की छतों में लोग नहीं होते, हाँ, पानी की टंकियाँ होती हैं… डीटीएच की छतरियां होती हैं… खिड़की से चिपकी AC की मशीनें होती हैं… Wi-Fi के सिग्नल होते हैं। शायद, इतना कुछ छत… Continue Reading →

सोच सेगमेंट

बंद कमरे में बैठकर पुरानी यादों के सहारे अगर ज़िंदगी चलती, तो जिंदगी की नई राहों पर नये राहगीर कभी न मिलते।

सोच सेगमेंट

रिश्तों में मिलने वाले  पहचान के लोगों से, रास्तों में मिलने वाले अजनबियों को समझ पाना ज्यादा आसान है क्योंकि रास्ता तो कुछ ही दूरी तक है मगर रिश्ते ताउम्र तक |

सोच सेगमेंट

रुकेंगे जो सफ़र में तो मंजिल क्या करेगी? वो इंतज़ार तो कर सकती है मगर एक वक़्त तक ……

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