जब चीरती हुई नज़रों से परखा जाता हूँ मैं,
जब भी सवालों से खुद को घिरा पाता हूँ मैं।
जब भी वतनपरस्ती की कसौटी पे कसा जाता हूँ मैं,
जब भी टोपियों और कुर्ते से पहचाना जाता हूँ मैं।।

मज़हब की निशानियों, तरतीबों तरकीबों से,
घसीट कर अलग सा दिखलाया जाता हूँ मैं।
मुझे मज़हब के चश्मे से घूरते हुए लोगों से,
अनजानी सी सिहरन में सहम जाता हूं मैं।।

चैनलों पे चिंघाड़ती हुई आवाज़ों के बीच,
खुद को ज़ब्त हुआ पाता हूँ मैं।।
पुरखों के दास्तानों से न कोई तसव्वुर मेरा,
गर बार बार खींच के ले जाया जाता हूँ मैं।।

मैं तुम जैसा ही हूँ, तुम भी तो मेरे जैसे ही हो,
ऐसे ऐसे अल्फ़ाज़ ढूंढ कर लाता हूँ मैं।
लाखों बार कह कह कर जब मैं,
घुट घुट कर ये सारे सितम घोंट जाता हूँ मैं।।

इतने सवालों के घेरे है चारो तरफ,
न जाने कौन से पहरे हैं चारों तरफ।
हर पहरे की नज़र में खुद को पाता हूँ मैं,
दिल से जुबां से डर जाता हूँ मैं।।

खुद को जब भी इस तकलीफ में पाता हूँ मैं,
आंखे मूंद कर दिल को तसल्ली दे जाता हूँ मैं।
इस मुल्क की मिट्टी को समेटे हुए,
दफन भी तो हो ही जाता हूँ मैं।।

आज कौन हूँ मैं, आज कौन हूँ मैं।।

– आदिल इफ़्तिख़ार