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II अपनी भाषा , अपना मंच II

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कहानी

इंतज़ाम

दिनभर की मेहनत से थके शरीर रात में खाने के सामने या बिस्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे, परन्तु कुछ जीवन अभी भी भटक ही रहे थे । ऐसा ही एक जीव था किशन। ओम के दरवाजे पर… Continue Reading →

समंदर या पहाड़?

जुहू बीच पर बैठे हुए उसने उसका हाथ पकड़कर पूछा, तुम्हें समंदर पसंद है या पहाड़? उसने उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए उसकी आँखों में झांका और कहा, मुझे समंदर पसन्द है। लड़का असमंजस में आ गया और… Continue Reading →

दस का नोट

दाखिले के फॉर्म में जेंडर के दो ही कॉलम दिखे मुझे, पढ़ने को बाहरगांव में रहने को हॉस्टल तक नहीं मिला था सिनेमा हॉल के बाहर का वॉशरूम भी जगह नहीं दे पाया था लेकिन मैं फिर भी तैयार थी… Continue Reading →

वो उस सुबह तुम्हारा जाना

मैंने सोचा था कि उस ट्रेन से उतर जाऊँ, बोल दूँ जो मेरे अंदर चल रहा था। उस रोज ट्रेन के समय पर आने पर पहली बार बड़ा दुःख हुआ शायद जैसे किसी अनचाही , बिन मांगी चीज़ हो रही… Continue Reading →

गोवा एक्सप्रेस वाली

रात 12:40 बजे। एसएमएस आया, ‘आप आओगे, अमित?’ मैंने उसे बताया नहीं था कि मैं उससे मिलने स्टेशन आ रहा हूं। दरअसल, उस समय तक तो मुझे भी पता नहीं था। 1:15 की ट्रेन थी। मैंने झटपट अपनी डुगडुगी बाइक… Continue Reading →

शहर

प्रतिदिन की तरह आज महिला डिब्बे में न जाकर मैं सामान्य डिब्बे में ही चढ़ गई क्यूंकि प्लेटफॉर्म की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते ही मेट्रो ट्रेन सामने आकर खड़ी हो गई थी। दरवाज़े बायीं ओर खुले और बन्द हो गए। डिब्बे के… Continue Reading →

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