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ग़ज़ल

हुज़ूर आपको ये दिल ये जान देते हैं
ये तोहफ़े आपके शायान ए शान देते हैं

ये अश्क ए हिज्र बड़े इम्तेहान देते हैं
मगर ये आईने सच्चा बयान देते हैं

अगर ये अश्क मेरे पत्थरों प गिर जाएं
जो भर न पाएं वो गहरे निशान देते हैं

अब इसको घर जो बना दो तो कोई बात बने
तेरे हुज़ूर हम अपना मकान देते हैं

सर ए वरक़ उसी ज़ालिम का नाम लिख कर हम
बड़े सुकून से हर इम्तेहान देते हैं

ज़मीन ए दिल प उगाई थी फ़स्ल ए इश्क़ कभी
सो आज तक हम उसी का लगान देते हैं

ख़्याल जाता है जब उस गली तक अये साक़ी
हमारा साथ सभी आसमान देते हैं

– अहमद अली खान