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वो उस सुबह तुम्हारा जाना

मैंने सोचा था कि उस ट्रेन से उतर जाऊँ, बोल दूँ जो मेरे अंदर चल रहा था।
उस रोज ट्रेन के समय पर आने पर पहली बार बड़ा दुःख हुआ शायद जैसे किसी अनचाही , बिन मांगी चीज़ हो रही है।
सुबह के करीब सात बजे थे, रेलवे स्टेशन पर भीड़ काफी ज्यादा थी, इतने शोर गुल में भी दिल में काफी सन्नाटा सा था।
बहुत कुछ में कहना तो चाह रही थी, पर वो ट्रेन के हॉर्न की आवाज आयी मनो कह रही थी चलो इस दुनिया से।ट्रेन के हॉर्न की आवाज सुनकर दिल की धड़कन कुछ यूँ ही हो गई थी मनो कोई पटरी से  सुपरफास्ट ट्रेन निकल रही हो।
तुम डिब्बे से उतर के जाने लगे, तुम्हारा जाना मेरी खुशियों का जाना सा लगा,फिर भी मैं हाथ हिलाते हुए डिब्बे में बैठी रही , उस सीट पर बैठकर तुम्हारे जाने को देखा, तुम्हारे उतर जाने पर यूँ ही तुम्हारी बातें सुन रही थी ; फिर तुम्हें देखकर ये सोचने लगी की ये जाना इतना कष्टदायक क्यों होता है, क्या जो मेरे अंदर चल रहा है वो तुम भी महसूस कर रहे हो और समझ रहे हो।

सोच ही रही थी की कुछ बोलूं पर फिर उस बेकाबू ट्रेन ने एक और हॉर्न दिया और वो चल पड़ी,तुम्हारा हाथ मेरे हाथों से छूट गया , मेरी आँखों ने आंसू गिराना तो  चाहे पर तुम्हारे चेहरे की मुस्कान को देखकर उन आंसूओं को आँखों में ही कहीं रोक लिया।

सोचा तो था की वो ख़त उस सुबह तुम्हें  खुद दूंगी अपने हाथों से, पर इतनी हिम्मत थी ही कहाँ मुझ में।
वो ख़त जिसमें वो सब लिखा था जो मैं महससू करती हूं या जो अब तक महससू किया तुमसे मिलने के बाद,
वो सब जो मैं खुद तुमसे ना बोल पाई।

पर उस वक़्त मैंने मेरे अंदर की सारी भावनाओं को मैंने एक दिल में कैद कर लिया और तुम्हें दे दिया,
शायद मेरे आँखों में और दिल में इतनी हिम्मत ना थी की तुम्हारी प्रत्यक्ष ना सुन पाऊँ, इसीलिए चल पड़ी उस ट्रेन के साथ ,अंदर इस वादे के साथ की जो जैसा है उसे वैसे ही चलने देती हूँ और तुम्हारा मेरा होना या न होना किस्मत और तुम्हारे हवाले छोड़ देती हूँ।

 

– तनुश्री उपाध्याय