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कंबल

बहुत दिनों बाद दोनों दोस्त आज काॅफी हाउस में मिले।गर्मागर्म कॉफ़ी की चुस्कियों के साथ 2019 आम चुनाव की बातें चलने लगीं। बातें जो शुरु हुईं,तो ख़त्म होने का नाम ही न ले रही थीं। ठहाके पर ठहाके, वातावरण खुशनुमा लग रहा था।
बॉबी ने कहा – 2014 में 2 लाख का एड मिला था इस बार देखते हैं कितने का मिलता है।
यश ने कहा – यार, पिछले लोकसभा चुनाव में तो मेरा उम्मीदवार जीत गया था इस बार देखते हैं बुलाता है कि नहीं। ख़ैर जो भी हो लेकिन चुनाव के दिनों में काम के साथ साथ ऐश करने का मौक़ा भी ख़ूब मिलता है।
गुफ़्तगू का तवील सिलसिला चला और आख़िरकार चुनावी माहौल से भरपूर फ़ायदा उठाने के संकल्प के साथ काॅफी हाउस का बिल अदा करके दोनों दोस्त रुख़्सत हुए।

हालांकि अभी चुनाव की तारीख़ों का ऐलान नही हुआ था लेकिन तैयारियों का सिलसिला शुरू हो चुका था।
एक दिन पुर्व सांसद ने यश शर्मा को याद किया और उस पर पुन: भरोसा जताते हुए चुनाव पुर्व तैयारियों की ज़िम्मेदारी उसे सौंप दी।
अनन्या, एनजीओ चलाने वाली एक महत्वकांक्षी महिला थी। वैसे तो सालों भर अपने एनजीओ की आड़ में कुछ न कुछ कमाती ही रहती थी लेकिन चुनावी मौसम का उसे भी बेसब्री से इंतज़ार रहता था।
जब यश शर्मा ने पुर्व सांसद की तरफ़ से पांच गांवों में पांच सौ कंबल बांटने का अॉफर दिया तो अनन्या ने फ़ौरन मंज़ूर कर लिया। बदले में उसने यश को भी ख़ुश कर दिया।
इधर बॉबी को भी लंबी बेकारी के बाद इस चुनावी मौसम में एक दबंग उम्मीदवार से ढ़ाई लाख का विज्ञापन मिल ही गया। उसने मन ही मन सोचा, काश ये चुनाव हर साल होते तो कितना अच्छा होता।

उधर फागुन की कनकनाहट चुनाव के मौसम में भी गांव के लोगों को घूरा तापने पर मजबूर कर रही थी।
घूरा पर बैठे रमेश राजभर ने बीड़ी धूकते हुए अकलू देवान से कहा –
कल भोरे चारे बजे चलके लाइन में लग जाना है मुखिया जी के दुआर पर। सुने हैं वहाँ ट्रक भर कंबल आया है बांटने के लिए। एक घर में एक कंबल मिलेगा!
अकलू ने पूछा –
लेकिन बांट कौन रहा है और क्यों बांट रहा है ?
रमेश – कौनो नेता है, सुने हैं, एम पी वाला चुनाव लड़े वाला है। वैसे 19 में चुनाव आ रहा है अब तो रोज कुछ न कुछ बंटेगा।
अकलू- कुछ भी हो, कंबल मिलने से जाड़े का इंतजाम हो ही जाएगा और का चाहिए हम लोगों को।
रमेश – मेहमानों की तरह पूछ रहेगी, जब तक चुनाव बीत नही जाता।
अकलू – और उसके बाद ?
रमेश – उसके बाद का – – कमाना है खाना है।
अकलू – पर यूँ तो गरीब आदमी का भला नही हो सकता, और ना ही गाँव और देश का।
रमेश – तू एक काम कर अकलू , ढ़ेर गाँव देश की चिंता है तो तु भी नेता बन जा।
अकलू ने बीड़ी का कश लगाते हुए कहा – नेता बने खातिर पहले बांटना पड़ता है, फिर लूटने का मौका मिलता है, और अपने पास बांटने के लिए है क्या – –
ना कंबल – – ना दारू – – – ना पैसा!

रमेश ने घूरा से आलू निकाला और गरम गरम खाते हुए बोला –
तू तो बड़ी अकलमंद है अकलू, फिर गाँव देश की चिंता काहे करता है। गाँव देश का चिंता तो वही न करेगा जिसके पास बांटने का दम होगा।
अकलू ने गमछा कान पर कसते हुए कहा –
हां भाई – – हम लोगों को गाँव देश की चिंता करने का कौनो जरूरत नही है। जो गाँव देश को लूटे, वो करे चिंता!
रमेश एक गरमा गरम आलू, अकलू की तरफ बढ़ाते हुए बोला – फिलहाल तो तू कंबल की चिंता कर!
अकलू बोला – ठीक है – – सुबहिया में अपने साथ ले चलना हमको भी मुखिया के दुआर पर!
पांच साल तक तो हम लुटते ही हैं, चुनाव के समय भी तो हम लूट लेंं – – – – एक कंबल!

रात में रमेश ने अपनी पत्नी कुमुदिनी को समझाया कि चहल पहल बढ़ने से पहले ही दो तीन बार लुगा बदल बदल के, दो तीन गो कंबल झटक लाना। कोई घुंघट उठा उठा के थोड़ी निहारेगा। दु गो मिल गया तो हम लोगों का जाड़ा आराम से कट जाएगा और मुझे जो मिलेगा वो कंबल बाबूजी को दे दूंगा।
उधर पौ फटने से पहले ही अनन्या पांचों मुखिया की मुठ्ठी गरम कर-कर के पांचों गांवों में पचास-पचास कंबल बांट कर, सौ सौ का वाउचर पास करा चुकी थी।

इधर अकलू को छोड़, रमेश अपनी लुगाई के साथ पांच बजे भोर ही में पहुंच गया मुखिया के दुआर पर, जहां पहले से ही चालीस पचास आदमी लाइन में लगे हुए थे।
उसने अपनी पत्नी को केहुनी मारते हुए कहा – ” देख लो, नरको में ठेला ठेली “!
बहरहाल उस धक्कम धक्का में देर से आए अकलू को कंबल ना मिलना था ना मिला!
चतुर चपल रमेश और कुमुदिनी ने मिल कर भी सिर्फ़ एक कंबल हासिल किया और अकलू बेचारे को ख़ाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
-अब्दुल ग़फ़्फ़ार