“प्रेम” को

कह सकते है हम
प्रतीक्षायें और प्रार्थनाएं

जो एक युग से शुरू होकर
अंतिम युग तक जिंदा रहती है
भिन्न भिन्न रूपों में ये विचरण करती है

बदनामी की सड़कों पर तो घायल होती है
कभी ऊबड़ खाबड़ सी बंदिशों में!

ये करती है सामना नाउम्मीदों की मलिन बस्तियों का
जिसमें मौजूद
ओक्षी परंपराओं का दलदल बार- बार करता है
इनसें दलाली
इस दलदल में फंसकर करती है बर्बाद ख़ुद को
तो कभी
बर्बाद होकर ख़ुद को करती है
आबाद!

कितनी पीड़ाएं बसी हुई है
मेरे दिल में
जिससे दिल अब अधमरा हो गया है
सांत्वना की खाट पर लेटकर
सिसकियां लेता
कभी उम्मीद की करवटें
दिल को पुचकार देती है

पर ये पुचकारना होता है
कुछ देर के लिए

दिल का अधमरापन
दिल पर करता है वार
बुरी सदी जैसा

बुरी सदी के चक्रव्यूह
से निकल कर
फिर लौट आता है
अपनी पीड़ाओं में
जो उसे कभी नहीं छोड़ती।

-विभा परमार