काफ़िले का शौक़ था
पर घटते क्रम की गिनती जैसे
लोग ज़िन्दगी में दहाई से इकाई हो गए
भीड़ बनाम अकेलेपन के नफे नुकसान से परे
शोक मना लिया न
अब शुक्र अदायगी करते हैं
ज़िल्लत नही इज़्ज़त मिले जहां
ऐसी शालीन जगह चलते हैं
चलो यहां से निकलते हैं

बहुत गिर लिए
उबड़-खाबड़ से पोले रास्तों पर
अब हटाकर दिमाग़ पर चढ़ी धूल को
फिर उस झड़ी धूल से
उन उबड़-खाबड़ पोले रास्तों को भरते हैं
हाल के लिए समतल करते हैं
चलो यहां से निकलते हैं

मन की दुखती रग को पकड़ती
कोई भी कुढ़न
जैसे आत्मा का धूम्रपान हैं
उसको निषेद्य करते हैं
यार अब बहुत हुआ
चलो यहाँ से निकलते हैं

-अनुपमा शर्मा