उनविंश का है यह प्रथम चरण
करती है लेखिनी अमर वरण
यह बीत चला है समय देख
शायद बदलेगी भाग्यरेख
अलसाई किस्मत जागेगी
रजनी भी तम संग भागेगी
जो बीत चुका वह कब लौटा
करते ही हैं सब समझौता
अब देखो आगे के पथ को
मत रोको जीवन के रथ को
मन निर्भय साहस को भर लो
दृण निश्चय आज अटल कर लो
यह वर्ष न यूँ ही जायेगा
कुछ आस नवल दे जायेगा
यह रात अमावस न होगी
ज्योत्सना सहित तमहर होगी
कल आँखों में सूरज होगा
मन सज्ज रणी रणधर होगा
घनघोर निराशा हारेगी
जीत सत्य हुंकारेगी
है आस की सब अच्छा होगा
जो झूठा है सच्चा होगा
नव आस हर्ष हिय धरते हैं
उनविंश का स्वागत करते हैं

-शाम्भवी मिश्रा