आग पल रही है अंतर में
कैसा जीवन सुखदायी है
कहते सात जनम का रिश्ता
इंतज़ार दुखदायी है

मन पागल लेकर पंख हवा से
अनंत तक उड़ जाता है l
चाहे अनचाहे अनजाने में
भव बंधन जुड़ जाता है l

लाख करुँ आज प्रतीक्षा में
देरी होने वाली हो तो होगी
काल नहीं होता रे दाता
यंत्रणाए इसकी , सब उसके भोगी

किसका है ये शासन
सब छोड़ चुके अनुशासन
अपने मन के राजा है सब
राजा भोग रहा निर्वासन

लाख करे नीलम मणियों की अभिलाषा
याचक नही बन सकता है दाता
बस तीनो काल कठिन इस जीवन के
वे जो कर जाये बन भाग्य विधाता

तप्त क्षिप्त प्रस्तर खण्डों सी
कोरी जीवन की अभिलाषा
गरल पान करते सब अक्सर
फलीभूत न होती अमिय आशा

वो लुटाता है नीलम मणियां
काल के तीनो मेलो में
वही पाता है सब कुछ
प्रवीण हो जो काल के खेलो में

-प्रोफेसर डॉ संतोष कुमार शर्मा